'जो शरिया पढ़ रहे, उन्हें देश में घुसने नहीं दूंगा', मुस्लिम होकर कट्टरपंथ को नकारा, कौन हैं 38 साल के धाकड़ लीडर?
Updated on
19-07-2026 07:46 PM
कुछ देशों का हमें नाम भी नहीं पता होता लेकिन उनके लीडर इतने प्रभावशाली होते हैं कि उनकी चर्चा होती ही रहती है. कुछ ऐसे ही लीडर कैप्टन इब्राहीम ट्राओरे हैं, जो एक छोटे से लैंडलॉक्ड देश बुर्कीना फासो को राष्ट्रपति हैं. उनके बारे में सोशल मीडिया पर अक्सर चर्चा छिड़ी रहती है, जिसकी वजह हैं उनके बयान. बुर्कीना फासो में मुस्लिमों की आबादी सबसे ज्यादा है लेकिन इस देश की कमान संभालने के बाद से ट्राओरे हमेशा इस बात को मुखर होकर कहते रहे हैं कि वे अपने देश का इस्लामीकरण नहीं बल्कि विकास करना चाहते हैं. यही वजह है कि सोशल मीडिया पर उनको पसंद करने वालों की तादाद अच्छी खासी है
बुर्किना फासो के अंतरिम राष्ट्रपति कैप्टन इब्राहिम ट्राओरे ने हाल ही में एक स्पष्ट और दृढ़ संदेश दिया है-
‘मैं मुस्लिम हूं, लेकिन बुर्किना फासो में हर नागरिक को अपनी धर्म की स्वतंत्रता है. इस देश में कभी भी शरिया कानून नहीं लागू होगा.’
उन्होंने सऊदी अरब में शरिया कानून की पढ़ाई कर रहे बुर्किनाबे छात्रों को चेतावनी दी कि वे वापस न लौटें. उन्होंने उन्हें चेताते हुए कहा है – ‘तकनीकी ज्ञान और कौशल हासिल करने के बजाय आप शरिया पढ़ रहे हैं, तो वहीं रहें, यहां वापसी की अनुमति नहीं होगी.’ उनका यह बयान देश की धार्मिक सद्भाव, राष्ट्र निर्माण और अतिवाद के खिलाफ लड़ाई को रेखांकित करता है, जो सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है.
कौन हैं इब्राहीम ट्राओरे?
इब्राहिम ट्राओरे का जन्म 14 मार्च, 1988 को हुआ. सितंबर, 2022 में सैन्य तख्तापलट के माध्यम से सत्ता संभालने वाले इस युवा नेता ने देश को उपनिवेशवाद, भ्रष्टाचार और जिहादी विद्रोह से मुक्ति दिलाने का वादा किया. पैन-अफ्रीकी, राष्ट्रवादी और एंटी-इंपीरियलिस्ट विचारधारा रखने वाले ट्राओरे ने अल-सालेह स्टेट्स गठबंधन को मजबूत किया. वे सुरक्षा, संप्रभुता और स्थानीय परंपराओं पर आधारित न्याय व्यवस्था पर जोर देते हैं. उनके शासन में देश फ्रांस जैसी ताकतों से दूरी बनाकर रूस और अन्य सहयोगियों की ओर मुड़ा है. हालांकि सुरक्षा स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है.
मुस्लिम बहुल आबादी वाला देश-बुर्कीना फासो
बुर्किना फासो में आबादी लगभग 2.2 करोड़ है. साल 2019 की जनगणना के मुताबिक 63.8 प्रतिशत मुस्लिम यहां मौजूद हैं, जिसमें ज्यादातर सुन्नी, मालिकी स्कूल और सूफी प्रभावित हैं. 26.3 फीसदी ईसाई और 9 फीसदी पारंपरिक अफ्रीकी धर्मों को मानने वाले हैं. देश संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है और संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है. ट्राओरे का बयान इस पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है. देश में 2016 से जिहादी समूहों (JNIM, S Sahel) का आतंक बढ़ा है. इन समूहों ने गांवों पर हमले, गिरजाघरों और मस्जिदों पर हमले किए, सैकड़ों नागरिकों की हत्या की और लाखों को विस्थापित किया. 2024-25 में हिंसा और बढ़ी, जिसमें हजारों मौतें हुईं.
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